''छन्नू लाल दिलगीर'', उर्दू के एक मर्सिया कवि, का जन्म 1780 के आसपास लखनऊ में हुआ था|लखनऊ, ब्रिटिश भारत में भारत में राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की राजधानियों की वर्तमान सूची|भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश। उन्होंने ''दिलगीर'' को अपने तखल्लुस/छद्म नाम के रूप में इस्तेमाल किया।
== प्रारंभिक जीवन और परिवार ==
उनका जन्म एक हिंदू|हिंदू परिवार में हुआ था। मुंशी चुन्नी लाल, राजा झाऊलाल के भाई, आसफ-उद-दौला के उपप्रधानमंत्री|लखनऊ के नवाब आसफ-उद-दौला। चूंकि वह राजा झाऊलाल के भाई थे, इसलिए उनका पालन-पोषण और माहौल बहुत सकारात्मक था।
== शिक्षा ==
''मिर्जा खानी नवाजिश'' उनके पहले उस्ताद थे। इसके बाद उन्होंने ''नासिख'' सीखा।
== कृतियाँ और कविता ==
आज के ख़राब माहौल में किसी हिंदू कवि को कर्बला की लड़ाई के शहीदों के सम्मान में "मर्सिया|मर्सियास" लिखते देखना दूसरे ग्रह की कहानी जैसा है। कवि मुसहफ़ी ने छन्नू लाल की कविता की सराहना करते हुए कहा कि वह मूल रूप से एक ग़ज़ल कवि थे जिनका तखल्लुस/छद्म नाम ''''''तरब''''''' था। अंततः उन्होंने अपना ध्यान मर्सिया में स्थानांतरित कर दिया और मोती-झील, लखनऊ में अपना ग़ज़ल दीवान स्थापित किया।
बाद के चरण में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया और अपना नाम बदलकर ''गुलाम हुसैन'' रख लिया। उनकी रचनाओं में पैगंबर और उनके परिवार से जुड़ी घटनाओं का वर्णन है। मीर खालिक और मिर्जा फसीह उनके समकालीन थे। वाणी की कमजोरी के कारण उन्होंने मर्सिया नहीं पढ़ा, लेकिन उनकी रचनाएँ नवीन थीं।
"''ग़बराए गी ज़ैनब'''' छन्नू लाल दिलगीर द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध मरासिया है जिसे नासिर जहां ने 1956 में पहली बार रेडियो पर सुनाया था।
[h4] ''छन्नू लाल दिलगीर'', उर्दू के एक मर्सिया कवि, का जन्म 1780 के आसपास लखनऊ में हुआ था|लखनऊ, ब्रिटिश भारत में भारत में राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की राजधानियों की वर्तमान सूची|भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश। उन्होंने ''दिलगीर'' को अपने तखल्लुस/छद्म नाम के रूप में इस्तेमाल किया। == प्रारंभिक जीवन और परिवार == उनका जन्म एक हिंदू|हिंदू परिवार में हुआ था। मुंशी चुन्नी लाल, राजा झाऊलाल के भाई, आसफ-उद-दौला के उपप्रधानमंत्री|लखनऊ के नवाब आसफ-उद-दौला। चूंकि वह राजा झाऊलाल के भाई थे, इसलिए उनका पालन-पोषण और माहौल बहुत सकारात्मक था। == शिक्षा == ''मिर्जा खानी नवाजिश'' उनके पहले उस्ताद थे। इसके बाद उन्होंने ''नासिख'' सीखा।
== कृतियाँ और कविता == आज के ख़राब माहौल में किसी हिंदू कवि को कर्बला की लड़ाई के शहीदों के सम्मान में "मर्सिया|मर्सियास" लिखते देखना दूसरे ग्रह की कहानी जैसा है। कवि मुसहफ़ी ने छन्नू लाल की कविता की सराहना करते हुए कहा कि वह मूल रूप से एक ग़ज़ल कवि थे जिनका तखल्लुस/छद्म नाम ''''''तरब''''''' था। अंततः उन्होंने अपना ध्यान मर्सिया में स्थानांतरित कर दिया और मोती-झील, लखनऊ में अपना ग़ज़ल दीवान स्थापित किया।
बाद के चरण में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया और अपना नाम बदलकर ''गुलाम हुसैन'' रख लिया। उनकी रचनाओं में पैगंबर और उनके परिवार से जुड़ी घटनाओं का वर्णन है। मीर खालिक और मिर्जा फसीह उनके समकालीन थे। वाणी की कमजोरी के कारण उन्होंने मर्सिया नहीं पढ़ा, लेकिन उनकी रचनाएँ नवीन थीं।
"''ग़बराए गी ज़ैनब'''' छन्नू लाल दिलगीर द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध मरासिया है जिसे नासिर जहां ने 1956 में पहली बार रेडियो पर सुनाया था।